29 जून (शनिवार) को करे योगिनी एकादशी का व्रत

By | June 26, 2019

हिन्दू धर्म में एकादशी का दिन बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना गया है, हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियाँ आती है, जिस वर्ष यदि मलमास पड़ता है, उस साल इसकी संख्‍या बढ़कर 26 हो जाती है। प्रत्येक मास 2 एकादशियाँ आती है जिसमे से आषाढ़ मास के कृष्‍ण पक्ष में आने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है ।

पुराणों में योगिनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि इसी एकादशी तक भगवान विष्णु जागृत रहते हैं। इसके बाद देवशयनी एकादशी आती है जिसमें भगवान विष्णु चार मास के लिए शयन में चले जाते हैं। इसी कारण योगिनी एकादशी का महत्व बहुत बढ़ जाता है । इस वर्ष यह एकादशी 29 जून (शनिवार) को पड़ रही है।

योगिनी एकादशी व्रत कथा

एक समय की बात है, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा “हे भगवन, मै आपको नमस्कार करता हूँ , मैंने आपसे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के व्रत का माहात्म्य सुना। अब आप मुझे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की कृपा करे, इस एकादशी का क्या नाम है ? इसका क्या माहात्म्य है? यह सब आप मुझे बताने की कृपा करे ।

यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ” हे राजन! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। इस व्रत को करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह एकादशी इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। अब मैं तुमसे पुराणों में वर्णित इस व्रत कथा को कहता हूँ। तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो।” 29 जून (शनिवार) को करे योगिनी एकादशी का व्रत 1

प्राचीन समय की बात है, स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक प्रतापी राजा रहता था। वह राजा शिव का बहुत बड़ा भक्त था और प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करता था। उसके राज्य में हेम नाम का एक माली था जो राजा के पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। उस माली हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर पत्नी थी। एक दिन वह माली मानसरोवर से पूजा के लिए पुष्प ले कर आया परन्तु कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से रमण करने लगा और वह पुष्प देने के लिए नहीं गया ।

इधर राजा अपने महल में उसकी प्रतीक्षा करता रहा। परन्तु काफी समय बीतने के बाद भी जब वह माली नहीं आया तो राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के ना आने का कारण पता करो । सेवकों ने जाकर पता लगाया और राजा से कहा ” हे महाराज, वह पापी अतिकामी है और अपनी स्त्री के साथ हास्य-विनोद और रमण कर रहा है । यह बात सुनकर राजा कुबेर क्रोधित होगए और उन्होंने हेम को तुरंत बुलाने की आज्ञा दी ।

हेम माली राजा के भय से काँपता हुआ दरबार में ‍उपस्थित हुआ। तब राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- ‘अरे पापी! नीच! कामी! तूने मेरे परम पूजनीय ईश्वरों के ईश्वर श्री शिवजी महाराज का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी बन कर रहेगा “।

राजा कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। पृथ्वी पर गिरते ही उसके पूरे शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी पत्नी भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। अब तो हेम माली पृथ्वी पर आकर महान दु:ख भोगने लगा , वह भयानक जंगल में बिना अन्न और जल के विचरने लगा ।

रात्रि को निद्रा भी नहीं आती थी, परंतु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसको पिछले जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य रहा। घूमते-घ़ूमते एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँच गया, जो ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और जिनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान लगता था। हेम माली वहाँ जाकर उनके पैरों में पड़ गया और उनसे विनती करने लगा ” हे ऋषिवर, मेरी रक्षा करो। मुझे इस शाप से मुक्ति दिलाओ “।

माली की यह बात सुनकर दयावश मारर्कंडेय ऋषि ने कहा ” हे पुत्र, किस पाप के प्रभाव के कारण तुम्हारी यह दशा हो गई। तब हेम माली ने सारा वृत्तांत ऋषि से कह ‍डाला । यह सुनकर ऋषि बोले- “तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत कहता हूँ। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है, इस एकादशी का व्रत सभी पापो का नाश करने वाला है, इस लिए तुम इस एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो, ऐसा करने से तेरे सब पाप नष्ट हो जाएँगे।”

ऋषि की यह बात सुनकर हेम माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। और मुनि के कथनानुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसकी इस शाप से मुक्ति हुई और वह अपने पुराने स्वरूप में आकर अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

अंत में भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इस व्रत को करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह स्वर्ग को प्राप्त होता है।

जय श्री हरी
जय श्री नारायण

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