Dakshineswar kali mandir |दक्षिणेश्वर काली मंदिर

History of Dakshineshwar Kali Mandir

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

माता महा काली माँ दुर्गा के तीन रूपों में से सबसे अधिक भयानक रूप वाली मानी जाती है। कुछ वर्ष पहले मै कोलकाता में स्थित माता काली के प्रसिद्द मंदिर ” दक्षिणेश्वर काली मंदिर ” में माँ के पवित्र दर्शन करने के लिए गयी, और यहाँ आकर मुझे माँ की अदभुत शक्ति का अनुभव हुआ , मुझे ऐसा महसूस हुआ की इस मंदिर के कण कण में माँ काली विराजमान है और इसी कारण आज मैंने इस post में माँ काली के इस मंदिर के विषय में लिखने की सोची ताकि आप सब भी माँ काली के इस चमत्कारिक मंदिर के विषय में जाने और उनके दर्शन करने के लिए इस मंदिर में जाये !!

Dakshineswar kali mandir – माता महा काली माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों में से एक प्रमुख रूप मानी जाती है І यह सूंदर रूप वाली भगवती दुर्गा का काला और भयानक रूप है जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का वध करने के लिए ही हुई थी І माता महाकाली की उत्पत्ति काल अथवा समय से हुई है जो सबको अपना ग्रास बना लेती है І काली का अर्थ है “समय और काल ”  І काल तो सभी को अपने में निगल जाता है , माता काली है भयानक अंधकार और श्मशान की देवी І

वेदो के अनुसार “समय ही आत्मा है, आत्मा ही समय है ” І माता कलिका की उतपत्ति धर्म की रक्षा और पापी राक्षसों का विनाश करने के लिए ही हुई है  І माता काली को माता जगदम्बा की महामाया कहा गया है  І माता काली को देवी दुर्गा की 10 महा विद्याओ में से एक माना जाता है І माता काली माँ दुर्गा का वह रूप है जो अपने क्रूर रूप के बावजूद अपने भक्तो से प्यार का संबंध बनाये रखती है І हिन्दू धर्म शास्त्रों में माता काली अभिमानी राक्षसों का वध करने के लिए जानी जाती है 
Read more Kali mata ki aarti

history of dakshineshwar kali mandir

Dakshineswar kali mandir

kali mandir – माता काली को विशेष रूप से बंगाल में पूजा जाता है І बंगाल की राजधानी कोलकता में मुख्य रूप से माता काली की आराधना की जाती है  І कई लोगो का यह मानना है की कोलकाता में माता काली स्वयं निवास करती है और उन्ही के नाम पर इस स्थान का नाम कोलकता पड़ा І

कोलकता में ही माता काली का सबसे बड़ा मंदिर dakshineswar kali mandir के नाम से जगत प्रसिद्द है І दक्षिणेश्वर काली मंदिर हुगली नदी के तट पर बसा हुआ है और माता के 51 शक्तिपीठो में से एक शक्तिपीठ माना जाता है І पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान् विष्णु ने माता सती के शव के कई टुकड़े किये तब इस स्थान पर माता के दाएं पॉव की चार उँगलियाँ गिरी थी І इस मंदिर को माता काली का दिव्य धाम भी कहा जाता है  І

भक्तो के लिए यह स्थान किसी सिद्द स्थान से कम नहीं है І इस मंदिर में देवी काली की मूर्ति की जीभ खून से सनी  हुई है और देवी नरमुंडो की माला पहने हुए है І काली  माता का यह मंदिर नवरत्न की तरह निर्मित है और यह 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊँचा है І मंदिर के भीतरी भाग में चाँदी से बनाये हुए कमल के फूल जिसकी हजार पंखुड़ियां है पर माता काली शस्त्रों सहित भगवान् शिव के ऊपर खड़ी हुई है І

दक्षिणेश्वर काली मंदिर (Dakshineswar kali mandir) में कुल 12 गुबंद है Ι इस विशाल मंदिर के चारो और भगवान् शिव के 12 मंदिर स्थापित किये गए है Ι माता काली का dakshineswar kali mandir विशाल इमारत के रूप में एक चबूतरे पर स्थित है  Ι इसमें सीढ़ियों के माध्यम से प्रवेश किया जा सकता है Ι दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है  Ι ऊपर की दो मंजिलो पर नौ गुबंद समान रूप से फैले  हुए है Ι गुबंदों की छत पर सूंदर आकृतियाँ बनायीं गयी है Ι मंदिर के भीतरी स्थल पर दक्षिणा माँ काली, भगवान् शिव पर खड़ी हुई है Ι देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर रखी हुई है उसी पवित्र स्थल के आसपास भक्त बैठे रहते है और माँ की आराधना करते है Ι काली माता का मंदिर नवरत्न की तरह निर्मित है और यह 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊँचा है Ι

Read also Shiv ji ki aarti

माता महाकाली के इस पवित्र मंदिर (Dakshineswar kali mandir) का इतिहास भी बहुत सूंदर है Ι सन 1847 की बात है Ι जब भारत वर्ष में अंग्रेजों का शासन था Ι भारतवर्ष के पश्चिम बंगाल में उस समय रानी रामसनी नाम की एक बहुत ही अमीर विधवा रहती थी , रामसनी को धन की कोई कमी नहीं थी. परन्तु उसके जीवन में पति का सुख नहीं था. रानी रामसनी जब उम्र के चौथे पड़ाव पर आयी तो उनके मन में सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करने का ख्याल आया. रानी रामसनी की देवी माता में अत्यंत श्रद्धा थी. इसी कारण उन्होंने सोचा कि वह अपनी तीर्थ यात्रा का आरम्भ वाराणसी से करेगी और वहीँ रह कर देवी माता का कुछ दिनों तक ध्यान करेगी।

उन दिनों सन 1847 में कोलकता से वाराणसी तक जाने के लिए कोई रेलवे सुविधा उपलब्ध नहीं थी। कोलकता से वाराणसी तक जाने के लिए लोग नाव से जाया करते थे। जैसा की आप सब जानते है की दोनों ही शहरों से गंगा नदी गुजरती है इसलिए लोग गंगा के मार्ग से ही वाराणसी जाते थे। रानी रामसनी ने भी गंगा नदी के ही मार्ग से जाने की सोची, और फिर उनका काफिला वाराणसी जाने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जाने के ठीक एक रात पहले रानी रामसनी के साथ एक अजीब घटना घटी। उस रात रानी रामसनी मन में देवी काली का ध्यान करते हुए सो गयी। उसी रात्रि रानी को एक अजीब सपना आया। माता काली रानी के सपने में प्रकट हुई और उनसे कहा ” हे रानी, तुम्हे वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं, तुम गंगा नदी के किनारे मेरी प्रतिमा को स्थापित करो। तथा एक सूंदर मंदिर का निर्माण करवाओ। मैं उस मंदिर की प्रतिमा में स्वयं प्रकट हूँगी और अपने भक्तों की पूजा को स्वीकार करुँगी।”

History of Dakshineshwar kali mandir

यह स्वप्न देख कर रानी की आँख खुल गयी। इस स्वप्न पर पूरा विश्वास कर रानी ने अगले दिन अपनी वाराणसी की यात्रा स्थगित कर दी। अब रानी की आज्ञा पा कर उसके सेवको ने गंगा नदी के किनारे माता काली के मंदिर के लिए उचित स्थान खोजना आरम्भ कर दिया। कहा जाता है जब रानी रामसनी गंगा नदी के इस घाट पर उचित स्थान की तलाश करते हुए पहुंची तो उनके हृदय से यह आवाज आयी कि हाँ इसी जगह पर एक मंदिर का निर्माण होना चाहिए। यही वह जगह है जहाँ माता काली की प्रतिमा स्थापित होनी चाहिए। रानी के मन में ऐसा ख्याल आते ही वह जगह खरीद ली गयी और मंदिर बनाने का काम तेजी से आरम्भ हो गया।

यह बात सन 1847 की है और माता काली का मंदिर बन कर तैयार हुआ सन 1855 में अथार्त पूरे 8 वर्षो मेँ। कहा जाता है की जब यह मंदिर तैयार हुआ तो समाज के कुछ रूढ़िवादी लोगो को यह मंदिर पसंद नहीं आया। वे यह सवाल उठाने लगे की जो महिला उच्च कुल से नहीं है उसके धन से बने मंदिर में कोई कैसे पूजा कर सकता है। परिणाम स्वरूप कोई भी पुजारी उस मंदिर में पूजा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस मंदिर में पुजारी पॉव रखने से भी घबराते थे। हिंदुओ की पुरानी जाति व्यवस्था और बंगाल की कुलीन प्रथा की वजह से यहाँ रहना उस समय काफी जोखिम भरा माना जाता था। बाद में प्रसिद्द विचारक स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने मंदिर का कार्यभार संभाला। उन्होंने स्वयं को माता महाकाली के चरणों में समर्पित कर दिया। वह माता काली की भक्ति में इतना लीन रहते थे की लोग उन्हें पागल समझने लगे। एक दिन अर्ध रात्रि को जब उनकी व्याकुलता चरम सीमा पर पहुँच गयी तो माता काली ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें कृतार्थ कर दिया।

history of dakshineshwar kali mandir

दक्षिणेश्वर काली मंदिर (Dakshineswar kali mandir) से लगा हुआ स्वामी परमहंस देव का कमरा है जिसमे उनका पलंग तथा स्मृति चिन्ह सुरक्षित है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर (Dakshineswar kali mandir) के बाहर स्वामी परमहंस की पत्नी श्री शारदा माता तथा रानी रामसनी का समाधि मंदिर है और वह वट वृक्ष है जिसके नीचे परमहंस देव ध्यान करते थे। प्रतिवर्ष दूर दूर से लाखो लोग माता काली के पवित्र दर्शन करने के लिए यहाँ आते है।

मै भी माता काली के आर्शीर्वाद से दो बार इस मंदिर में उनके दर्शन कर चुकी हूँ और माता काली इतनी अधिक दयालु है की उन्होंने दोनों बार मेरी झोलियां भर कर ही मुझे इस मंदिर से भेजा है। माता काली, आपकी इस कृपा के लिए आपको आपकी बेटी ज्योति का कोटि कोटि धन्यवाद। यह बिलकुल सत्य है कि माता काली की इस प्रतिमा में सचमुच माता काली निवास कर रही है।

माता काली के इस चमत्कारिक मंदिर के खुलने का समय है :
सुबह का समय : 5. 30 बजे से 10 . 30 बजे तक
संध्या का समय : 4. 30 बजे से 7. 30 बजे तक

इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आप train से अथवा हवाई जहाज से पहुँच सकते है।

माँ काली के इस चमत्कारिक मंदिर के विषय में मैंने Youtube पर एक वीडियो भी बनाई है, आप नीचे दी हुई इस वीडियो पर click करे और इस वीडियो को अवश्य देखे !!

अंत में मै ज्योति गोयनका माता काली को कोटि कोटि प्रणाम करती हूँ और आप सबसे यह निवेदन करती हूँ की आप सब भी माँ के इस पवित्र मंदिर के दर्शन करने के लिए अवश्य जाये, माता काली आपके सभी दुःखो का निवारण कर देंगी, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है क्योंकि जहाँ आस्था है वहीं रास्ता है !!

जय माता काली जय माता काली जय माता काली

ज्योति गोयनका

2 thoughts on “Dakshineswar kali mandir |दक्षिणेश्वर काली मंदिर”

Leave a Comment