Jaise Karam karega vaise fal dega bhagwan (जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान्)

(जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान्)

मनुष्य जीवन सरल नहीं है, जीवन में कई प्रकार के संघर्ष और कठिनाइयां आती है , कितने ही दुःख आते है और ऐसे में हम यह सोचते है की हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ , ऐसा मैंने कौन सा पाप किया था जिसकी वजह से मुझे यह गहरा दुःख मिला है , मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर मेरे ही साथ हमेशा बुरा क्यों होता है I

परन्तु सत्य तो यह है की यह दुःख हमे हमारे कर्मो के कारन ही मिलते है , कल नहीं परसो नहीं परन्तु कभी ना कभी चाहे वह इस जनम में हो या फिर किसी ना किसी पूर्व जनम में ,हमारे दिया हुआ किसी को दुःख हमें वापिस अवश्य मिलता है, हमारे अपने करम कभी ना कभी हमारे पास करम फल बनकर अवशय आते है , हमारे द्वारा किया गया हर छोटे से छोटा अथवा बड़े से बड़ा कर्म भी हमारे सामने एक दिन अवशय आता है कर्मो की गति से कभी कोई नहीं बच पाता , यहाँ तक की राजा दशरथ , भगवान् राम , धृतराष्ट्र आदि सभी ने अपने कर्मो के फल भोगे I

एक समय की बात है, एक दिन भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरव सभा में गए । और वहाँ उन्होंने उद्दण्ड दुर्योधन को डपटते हुए अपना विराट् रूप दिखाया। इस दिव्य रूप को भीष्म, विदुर जैसे भक्तों ने देखा। ऐसे में धृतराष्ट्र ने भी कुछ समय के लिए आँखों का वरदान माँगा, ताकि वह भी भगवान् की दिव्य छवि निहार सके। कृपालु प्रभु ने धृतराष्ट्र की प्रार्थना स्वीकार की। तभी धृतराष्ट्र ने कहा- ” हे भगवन् आप कर्मफल सिद्धान्त को जीवन की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। सर्वेश्वर मैं यह जानना चाहता हूँ, किन कर्मों के परिणाम स्वरूप मैं अन्धा हूँ। आप तो सर्वज्ञानी है, आप यह सब मुझे बताने की कृपा करे “I

भगवान ने धृतराष्ट्र की बात सुनकर कहा ” धृतराष्ट्र इस सच्चाई को जानने के लिए मुझे तुम्हारे पिछले जन्मों को देखना पड़ेगा”। भगवान के इन वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र विगलित स्वर में बोले- “कृपा करें प्रभु, आपके लिए भला क्या असम्भव है”। कुरु सम्राट के इस कथन के साथ भगवान योगस्थ हो गए। और कहने लगे-” धृतराष्ट्र मैं देख रहा हूँ कि पिछले तीन जन्मों में तुमने ऐसा कोई पाप नहीं किया है, जिसकी वजह से तुम्हें अन्धा होना पड़े?”

(जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान्))

श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर धृतराष्ट्र बोले-” तब तो कर्मफल विधान मिथ्या सिद्ध हुआ प्रभु!” ” नहीं धृतराष्ट्र अभी इतना शीघ्र किसी निष्कर्ष पर न पहुँचो” और भगवान् श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र के विगत जन्मों का हाल बताने लगे। एक- एक करके पैंतीस जन्म बीत गए। 

परन्तु धृतराष्ट्र के प्रश्न का समाधान नहीं हो पा रहा था। तभी प्रभु बोले- “धृतराष्ट्र मैं इस समय तुम्हारे 108 वें जन्म को देख रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ- एक युवक खेल- खेल में पेड़ पर लगे चिड़ियों के घोंसले उठा रहा है। और देखते- देखते उसने चिड़ियों के सभी बच्चों की आँखें फोड़ दीं। ध्यान से सुनो धृतराष्ट्र, यह युवक और कोई नहीं तुम ही हो। विगत जन्मों में तुम्हारे पुण्य कर्मों की अधिकता के कारण यह पाप उदय न हो सका। इस बार पुण्य क्षीण होने के कारण इस अशुभ कर्म का उदय हुआ है। अथार्त तुम्हारे अपने कर्मो के कारन ही तुम इस जनम में नेत्रहीन हुए हो, इसमें किसी का कोई दोष नहीं है , हे धृतराष्ट्र, अपने करम चाहे वो पाप हो या पुण्य सभी का फल हमें कभी ना कभी भोगना ही पड़ता है I”

आशा करती हूँ की इस कहानी से आपको अपने प्रश्नो का उत्तर मिल गया होगा, इसलिए हमे सदा शुभ कर्म ही करने चाहिए I

आपको यह कहानी कैसी लगी , मुझे comments box में लिखना ना भूले I (जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान्)

धन्यवाद

ज्योति गोयनका

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