Ninda karne ka parinam /दूसरों की निंदा करने का यह है परिणाम

Ninda karne ka parinam

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कई बार मैंने whatsapp msgs में , सत्संग में , अक्सर सुना था की “किसी की पीठ पीछे उसकी बुराई अथार्त  निंदा नहीं करनी चाहिए | यदि हम ऐसा करते है तो उसके किये हुए पाप कर्म हमारे खाते (account )  में आ जाते है और उन पाप कर्मो को हमे भोगना पड़ता है “

परन्तु इस बात पर मैंने कभी ध्यान नहीं किया और अक्सर मै भी जिस किसी ने मेरा मन दुखाया हो या मुझे परेशान किया हो, अपने friends से मै भी उसकी निंदा करती थी, इस बात से अनजान की उसके कितने दुष्परिणाम मुझे भोगने पड़ेंगे |

यह मनुष्य का स्वभाव है (human nature ) है की जहाँ 4 लोग एक साथ बैठे हो तो वहाँ जो अनुपस्थित (absent) है , तो उसकी बुराई शुरू हो जाती है |अभी कुछ ही समय पहले मैंने youtube पर एक वीडियो देखी जिसमे एक महिला ने यह बताया था की दुसरो की निंदा करने से उसके सभी पाप कर्म हमारे खाते में (account) आ जाते है | शायद उस महिला के कहने का प्रभावशाली अंदाज था की वह बात मेरे mind में बैठ गयी और पहली बार (first time) मैंने इस बात पर गहराई से सोचा, “कि मै अपनी तरफ से सबके साथ अच्छा करने की कोशिश करती हूँ, फिर भी जीवन (life) में अक्सर कोई ना कोई समस्या (problem) तो बनी रहती है, कहीं ऐसा तो नहीं की जिन लोगो की मै निंदा करती हूँ, उन्ही की पाप कर्म मेरे खाते (account) में जमा हो रहे हो और मै उन्हीं के पाप कर्म की सजा (punishment) भोग रही हो

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मन में ऐसा ख्याल आते ही मैंने अपने ऊपर एक experiment करने की सोची 丨मैंने मन ही मन निश्चय (decide) किया की मै एक महीने तक किसी की निंदा, चुगली आदि नहीं करुँगी, तो देखते है की इससे एक महीने में मेरे जीवन (life) में क्या बदलाव (changes) आते है 丨

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और अगले दिन से ही मैंने अपने दोस्तों (friends) से किसी की भी निंदा, चुगली आदि करनी पूरी तरह से बंद कर दी 丨हालांकि कई बार ऐसे हालात भी हुए की जब किसी ने मेरा मन दुखाया (hurt) और मेरा मन हुआ की उसके बारे में मै अपने दोस्तों (friends) से शेयर (share) करू 丨और कई बार ऐसा भी हुआ की अनजाने में ही मेरे मुख से किसी के बारे में कोई बात निकलने वाली होती, लेकिन मै उसी समय अपने ऊपर control कर लेती थी 丨

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और ऐसा करते हुए मुझे पुरे 10 -11 दिन हो गए 丨मुझे रात को अक्सर ठीक से नींद नहीं आती थी परन्तु 10 -11 दिन के बाद ही रात को मुझे अच्छी नींद (sound sleep) आने लगी, ऐसी गहरी नींद कई सालो के बाद मुझे नसीब हुई थी और नींद पूरी होने के कारण मै खुद को पहले से अधिक ऊर्जावान (energetic) महसूस (feel) करने लगी थी丨शायद यह निंदा छोड़ने का ही परिणाम (result) था 丨

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और कुछ दिन बीते की मेरी एक जानकर महिला जो बहुत समय से किसी बात पर मुझसे नाराज थी और काफी समय से हमारी आपस में बातचीत भी बंद थी , अचानक ही उनका फ़ोन (phone call) आया और हमारे बीच अच्छे से बातचीत हुई और उस दिन के बाद से हमारे बीच सारे मनमुटाव भी दूर हो गए और हम अच्छे दोस्त (friends) बन गए 丨शायद यह निंदा छोड़ने का दूसरा परिणाम (result) था 丨

और 10 दिन बीते की मैंने महसूस किया की मैं अचानक ही सबके बारे में सकारत्मक (positive) सोचने लगी हूँ, अगर मुझे कोई कुछ गलत भी कहता था तो पहले की भांति मुझे बुरा नहीं लगता था 丨बल्कि मैं इन सब बातो को अब ignore कर देती थी और ऐसा करने से मै अब खुश रहने लगी थी 丨जब मै खुश रहने लगी तो घर का वातावरण (environment) भी अच्छा होने लगा, जिससे मेरे घर में सभी सदस्यों के बीच तालमेल, आपसी प्यार धीरे धीरे बढ़ने लगा 丨

और इस तरह calendar पर वो date भी आ गई , जब मुझे अपना यह experiment भी बंद करना था丨परन्तु इस 1 महीने में आये हुए सकारत्मक बदलाव (positive changes) के कारण मैंने अपना यह अपना यह experiment आगे तक जारी करने की सोची 丨अथार्त मैंने यह निश्चय (decide) किया की मै पूरा प्रयास करुँगी की दुसरो की निंदा बिलकुल ना करुँ 丨 हमे दुसरो की निंदा करने से क्या क्या भुगतना पड़ता है, इस बारे में शास्त्रों में वर्णित एक कहानी भी यहाँ लिख रही हूँ , ताकि आप सब इस बात को अच्छे से समझ सके 丨यह कहानी इस प्रकार इस प्रकार से है :

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राजा पृथु की कहानी (Ninda karne ka parinam)

बहुत पुरानी बात है, किसी राज्य में एक प्रतापी राजा पृथु राज्य करते थे , एक दिन राजा पृथु घूमते घूमते घोड़ो के तबेले में जा पहुँचे तभी वहीं एक साधु भिक्षा मांगने आ पहुंचा। सुबह सुबह साधु को भिक्षा मांगते देख राजा पृथु क्रोध से भर उठे। उन्होंने साधु की निंदा करते हुए बिना विचारे तबेलें से घोडें की थोड़ी सी लीद उठाई और साधु के भिक्षा पात्र में डाल दी। साधु भी शांत स्वभाव का था, उसने भिक्षा ली और वहाँ से चला गया और वह लीद उसने अपनी कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी।

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कुछ समय उपरान्त राजा पृथु शिकार के लिए एक वन में गए। शिकार करते करते राजा जब थक गए तो वह विश्राम के लिए कोई उचित स्थान तलाशने लगे, तब राजा पृथु ने जंगल में एक कुटिया देखी और देखा कि उस कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बड़ा सा ढेर लगा हुआ है । उन्होंने देखा कि यहाँ तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोडें दिखाई दे रहे हैं। फिर यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहाँ से आ गयी । वह आश्चर्यचकित हो उस कुटिया में गए । कुटिया में राजा ने एक साधु को बैठे देखा और वह साधु से बोले ” हे महाराज! आप हमें एक बात बताइए , यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं , और ना ही कोई तबेला है तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहाँ से आई !”

राजा की बात सुनकर साधु ने कहा ” हे राजन्! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी है , अब समय आने पर यह लीद उसी को खानी पड़ेगी।” साधु की बात सुन कर राजा पृथु को पूरी घटना याद आ गई। वह साधु के पैरों में गिर क्षमा मांगने लगे। उन्होंने साधु से प्रश्न किया ” हे महाराज, हमने तो थोड़ी-सी लीद दी थी, पर यह तो बहुत अधिक कैसे हो गई? ” तब साधु ने कहा “राजन, यह कुदरत का नियम है कि हम किसी को जो भी देते है , वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित होता जाता है और समय आने पर हमारे पास लौट कर आ जाता है, यह लीद का ढ़ेर उसी का परिणाम है।”

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यह सुनकर राजा पृथु की आँखों में अश्रु भर आये। वह साधु से विनती कर बोले “हे महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए, मैं आइन्दा ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।कृपया कोई ऐसा उपाय बता दीजिए! जिससे मैं अपने इस दुष्ट कर्मों का प्रायश्चित कर सकूँ!” राजा की ऐसी दुखमयी हालत देख कर साधु को दया आ गयी और उसने कहा “राजन्! एक उपाय है , आपको कोई ऐसा कार्य करना है जो देखने मे तो गलत हो पर वास्तव में गलत न हो। जब लोग आपको गलत देखेंगे तो वे आपकी निंदा करेंगे और जितने ज्यादा लोग आपकी निंदा करेंगे, आपका पाप उतना ही हल्का होता जाएगा। आपका अपराध निंदा करने वालों के हिस्से में चला जायेगा।”

यह सुन राजा पृथु ने साधु को प्रणाम किया और अपने महल में वापिस आ गए, अब राजा ने काफी सोच-विचार किया और अगले दिन सुबह से शराब की बोतल लेकर नगर के चौराहे पर बैठ गए। सुबह सुबह राजा को इस हाल में देखकर सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि” कैसा राजा है, कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है क्या यह शोभनीय है ??” आदि आदि!! परन्तु निंदा की परवाह किये बिना राजा पूरे दिन शराबियों की तरह अभिनय करते रहे। और लोग उसकी निंदा करते रहे 丨

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इस पूरे कृत्य के पश्चात जब राजा पृथु पुनः साधु के पास पहुंचे तो देखा कुटिया के बाहर लीद के ढेर के स्थान पर केवल एक मुट्ठी लीद ही थी, यह देख राजा आश्चर्यचक्ति हो गए और बोले ” हे महाराज! यह कैसे हुआ? इतना बड़ा ढेर कहाँ गायब हो गया!!” तब साधू ने कहा “राजन, यह आप की अनुचित निंदा के कारण हुआ है । जिन जिन लोगों ने आपकी अनुचित निंदा की है, आप का पाप उन सबमे बराबर बराबर बट गया है। अब आपका वह पाप उन सबके हिस्से में चला गया है “

अंत में इस कथा का यही सार है – ” जब हम किसी की अनुचित निंदा करते है तो हमें उसके पाप का बोझ भी उठाना पड़ता है तथा उसके किये हुए पाप का फल हमे भोगना पड़ता है ” अब निर्णय आप के हाथ में है !!!

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आपको यह कथा कैसी लगी, मुझे comments box में लिखना ना भूले,
धन्यवाद,
ज्योति गोयनका

6 thoughts on “Ninda karne ka parinam /दूसरों की निंदा करने का यह है परिणाम”

    • जी जरूर, मैंने अपनी कई पोस्ट में अपनी real life के अनुभव भी share किये है, आप मेरी पोस्ट प्राणायाम का महत्व भी पढ़े , इसमें भी मैंने अपना experience share किया है। thanks a lot

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