पंचतंत्र की कहानियाँ /Panchatantra ki kahaniya |Panchatantra stories in hindi

Panchatantra ki kahaniya – संस्कृत नीति कथाओं में पंचतंत्र का स्थान प्रथम माना जाता है丨पंचतंत्र की कहानियाँ बहुत ही जीवंत, ज्ञानवर्धक तथा प्रेरणादायक है 丨मनोविज्ञान, व्यवहारिकता तथा नैतिकता के सिद्धांतो से परिचित ये ज्ञानवर्धक कहानियाँ अत्यंत सरल भाषा में लिखी गयी है, और सभी विषयों को बहुत ही सरल तरीके से मनुष्य के सामने रखती है 丨प्रत्येक कहानी हमारे जीवन से संबंधित एक नयी शिक्षा देती है 丨पंचतंत्र की इन कहानियों में पात्रों के रूप में पशु पक्षियों का वर्णन अधिक किया गया है 丨पशु पक्षियों को आधार बना कर मानव को उचित ज्ञान देने की कोशिश की गयी है 丨

पंचतंत्र की ये कहानिया पंडित विष्णु शर्मा द्वारा करीब 200 वर्ष पहले लिखी गयी थी, कहा जाता है की करीब 2000 वर्ष पहले महिलारोग्य नामक नगर में राजा अमरशक्ति राज्य करते थे 丨उस राजा के यहाँ तीन पुत्रो ने जन्म लिया परन्तु राजा का दुर्भाग्य तो देखो कि ये तीनो पुत्र बिलकुल मुर्ख और मक्कार निकले 丨यह देख कर राजा को बहुत चिंता होने लगी की यदि ये पुत्र ऐसे ही रहे तो मेरे इतने बड़े राज्य का क्या होगा 丨

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राजा ने अपने पुत्रो को कई पंडितो से शिक्षा दिलवाई परन्तु उन मूर्खो को कोई अंतर् नहीं पड़ा 丨अब तो राजा घनी चिंता में डूब गए, तभी एक दिन उनकी सभा में एक मंत्री ने राजा को बताया कि उनके राज्य में एक पंडित विष्णु शर्मा रहते है जो महाज्ञानी है, वह उनके तीनो बेटो की शिक्षा के लिए उत्तम रहेंगे 丨यह सुनकर राजा ने पंडित विष्णु शर्मा को बुलवाया और उनसे अपने मुर्ख पुत्रों को शिक्षा देने की प्राथना की 丨राजा ने पंडित विष्णु शर्मा को बदले मेँ 100 गॉव ईनाम के रूप में देने का वचन दिया 丨परन्तु पंडित विष्णु शर्मा ने कहा ” हे राजन , मेँ तुम्हारे तीनो पुत्रो को उचित शिक्षा दूंगा परन्तु में बदले में कोई उपहार नहीं लूँगा 丨

( Panchatantra ki kahaniya )

( Panchatantra ki kahaniya )
( Panchatantra ki kahaniya )

पंडित विष्णु शर्मा महा ज्ञानी थे, उन्हें यह पता था के ये तीनो पुत्र उनकी बातो को समझने वाले नहीं है 丨इसलिए उन्होंने कुछ कहानियों के द्वारा उन्हें ज्ञान देने की सोची 丨और उन पुत्रो को ठीक से समझाने के लिए उन्होंने उन्हें पशु पक्षियों की कहानियाँ सुनाना आरम्भ किया 丨इस प्रकार की पशु पक्षियों की इन ज्ञानवर्धक कहानियो से पंडित विष्णु शर्मा ने उन मुर्ख पुत्रो को शिक्षित किया और वे पुत्र बुदिमान बनते चले गए 丨 ( Panchatantra ki kahaniya )

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और इस प्रकार जन्म हुआ पंचतंत्र की कहानियों का ! पंचतंत्र का अर्थ है : पांच तत्व, तो इसका अर्थ हुआ पांच तत्वों से घटने वाली कहानियां !! आरम्भ में ये कहानिया संस्कृत भाषा में लिखी गयी थी, परन्तु बाद में ये इतनी अधिक लोकप्रिय हो गयी की 50 अलग अलग भाषाओं में इनका अनुवाद किया गया 丨पंचतंत्र की इन कहानियों से ना केवल बच्चो को बल्कि सभी आयु के लोगो को एक नयी शिक्षा और नया ज्ञान मिला जिसने उनके जीवन के मार्ग को सरल बना दिया 丨आज उन्ही शिक्षाप्रद कहानियों में से कुछ कहानियों को में यहाँ आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ :

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Panchatantra ki kahaniya : आलसी ब्राह्मण ( The Lazy Brahmin)

बहुत समय की बात है. एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. उसकी ज़िंदगी बेहद ख़ुशहाल थी. उसके पास भगवान का दिया सब कुछ था. सुंदर-सुशील पत्नी, होशियार बच्चे, खेत-ज़मीन, धन सब कुछ था . उसकी ज़मीन भी बेहद उपजाऊ थी, जिसमें वह जो चाहे फसल उगा सकता था. लेकिन एक समस्या थी कि वह ब्राह्मण ख़ुद बहुत ही ज़्यादा आलसी था. वह कभी काम नहीं करता था. उसकी पत्नी उसे समझा-समझा कर थक गई थी कि अपना काम ख़ुद करो, खेत पर जाकर देखो, लेकिन वह कभी काम नहीं करता था. वो कहता, “मैं कभी काम नहीं करूंगा.” उसकी पत्नी उसके आलस्य से बेहद परेशान रहती थी, लेकिन वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी.

एक दिन एक साधु ब्राह्मण के घर आया और ब्राह्मण ने उसका ख़ूब आदर-सत्कार किया. तन मन से ब्राह्मण ने सम्मानपूर्वक उसकी सेवा की. साधु ब्राह्मण की सेवा से बेहद प्रसन्न हुआ और ख़ुश होकर साधु ने कहा कि “ हे ब्राह्मण,मैं तुम्हारे सम्मान व आदर से बेहद ख़ुश हूं, तुम कोई वरदान मांगो. में तुम्हे वह वर अवश्य दूंगा ” यह सुनकर ब्राह्मण को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. उसने कहा, “बाबा, आप कोई ऐसा वरदान दो कि मुझे ख़ुद कभी कोई काम न करना पड़े. आप मुझे कोई ऐसा आदमी दे दो, जो मेरे सारे काम कर दिया करे.”

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यह सुनकर बाबा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा, लेकिन ध्यान रहे, तुम्हारे पास इतना काम होना चाहिए कि तुम उसे हमेशा व्यस्त रख सको.अन्यथा वह तुम्हे खा जायेगा ” यह कहकर बाबा वहाँ से चले गए और उनके जाते ही एक बड़ा-सा राक्षसनुमा जिन्न ब्राहम्ण के सामने प्रकट हुआ. वह जिन्न कहने लगा, “मालिक, आप मुझे कोई काम दो, मुझे काम चाहिए.” Panchatantra ki kahaniya

ब्राह्मण उसे देखकर पहले तो थोड़ा डर गया और फिर कुछ सोचने लगा, तभी जिन्न बोला, “जल्दी काम दो वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.” ब्राह्मण ने कहा, “जाओ और जाकर खेत में पानी डालो.” यह सुनकर जिन्न तुरंत गायब हो गया और ब्राह्मण ने राहत की सांस ली और अपनी पत्नी से पानी मांगकर पीने लगा. लेकिन जिन्न कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला, “मालिक, मेरा सारा काम हो गया, अब मुझे और काम दो.” अब तो ब्राह्मण घबरा गया और बोला कि ” अब तुम आराम करो, बाकी काम कल करना.” परन्तु जिन्न बोला, “नहीं, मुझे काम चाहिए, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”

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ब्राह्मण सोचने लगा और बोला,“तो ऐसा करो, तुम जाकर पूरा खेत जोत लो, इसमें तुम्हें पूरी रात लग जाएगी.” यह सुनकर जिन्न वहाँ से गायब हो गया. आलसी ब्राह्मण सोचने लगा कि मैं तो बड़ा चतुर हूं. मैंने तो जिन्न को यहाँ से भगा दिया। वह अब खाना खाने बैठ गया और अपनी पत्नी से बोला, “अब मुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा, अब तो ज़िंदगीभर का आराम हो गया.” यह सुनकर ब्राह्मण की पत्नी सोचने लगी कि कितना ग़लत सोच रहे हैं उसके पति. इसी बीच वह जिन्न फिर वापस आ गया और बोला, “ मुझे काम दो, मेरा काम हो गया. जल्दी दो, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”

अब ब्राह्मण सोचने लगा कि “अब तो उसके पास कोई काम नहीं बचा. अब क्या होगा” ? परन्तु उस ब्राह्मण की पत्नी बहुत समझदार थी, उसने अपने पति से कहा : “सुनिए, मैं इसे कोई काम दे सकती हूं क्या?” पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण ने कहा, “दे तो सकती हो, लेकिन तुम इसे क्या काम दोगी?” ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “आप चिंता मत करो. वो मैं देख लूंगी.” वह जिन्न से मुखातिब होकर बोली, “तुम बाहर जाकर हमारे कुत्ते मोती की पूंछ सीधी कर दो. परन्तु ध्यान रहे, पूंछ पूरी तरह से सीधी हो जानी चाहिए.”

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अपने मालिक की आज्ञा पूरी करने के लिए जिन्न वहाँ से चला गया. उसके जाते ही ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “देखा आपने कि आलस कितना ख़तरनाक हो सकता है. पहले आपको काम करना पसंद नहीं था और अब आपको अपनी जान बचाने के लिए यह सोचना पड़ रहा कि उसे क्या काम दें.” अब ब्राह्मण को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वो बोला, “तुम सही कह रही हो, अब मैं कभी आलस नहीं करूंगा, लेकिन अब मुझे डर इस बात का है कि इसे हम आगे क्या काम देंगे, यह मोती की पूंछ सीधी करके आता ही होगा. मुझे बहुत डर लग रहा है. हमारी जान पर बन आई अब तो. यह तो हमें मार ही डालेगा.” ( Panchatantra ki kahaniya )

यह सुनकर ब्राह्मण की पत्नी हंसने लगी और बोली, “अब डरने की बात नहीं, तुम चिंता मत करो, वो कभी भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाएगा.” वहां जिन्न लाख कोशिशों के बाद भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाया. पूंछ छोड़ने के बाद फिर टेढ़ी हो जाती थी. और रातभर वह जिन्न यही करता रहा. ब्राह्मण की पत्नी ने ब्राह्मण से कहा, “ स्वामी ,अब आप मुझसे वादा करो कि कभी आलस नहीं करोगे और अपना काम ख़ुद करोगे.” ब्राह्मण ने पत्नी से वादा किया कि वह अपने काम खुद करेगा और दोनों चैन से सो गए.

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अगली सुबह ब्राह्मण खेत जाने के लिए घर से निकला, तो देखा जिन्न मोती की पूंछ ही सीधी कर रहा था. उसने जिन्न को छेड़ते हुए पूछा, “क्या हुआ, अब तक काम पूरा नहीं हुआ क्या? जल्दी करो, मेरे पास तुम्हारे लिए और भी काम हैं.” यह सुनकर जिन्न बोला, “मालिक मैं जल्द ही यह काम पूरा कर लूंगा.” ब्राह्मण उसकी बात सुनकर हंसते-हंसते खेत पर काम करने चला गया और उसके बाद उसने आलस हमेशा के लिए त्याग दिया.

सार : इस कथा का यही सार है की हमे आलस्य कभी नहीं करना चाहिए, हमे हमेशा अपना कर्म करना चाहिए क्योंकि कर्म ही जीवन है , कर्म ही पूजा है 丨 ( Panchatantra ki kahaniya )

Panchatantra stories in hindi : मुफ्तखोर मेहमान

एक राजा के शयनकक्ष में मंदरीसर्पिणी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा सो जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती। संयोग से एक दिन अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसे अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था।

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लेकिन खटमल भी कम चतुर ना था, वह चालाकी से बोलो ‘‘देखो बहन, मेहमान से ऐसा बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’ जूं उस खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई और उसे शरण देते हुए बोली, ‘‘ठीक है, भाई, तुम यहां रातभर रुक सकते हो, लेकिन राजा को काटोगे तो नहीं उसका खून चूसने के लिए।’’ खटमल बोला, ‘‘बहन, मैं तुम्हारा मेहमान है, मुझे कुछ तो दोगी खाने के लिए। और राजा के खून से बढ़िया भोजन और क्या हो सकता है।’’

‘‘ठीक है।’’ जूं बोली, ‘‘तुम चुपचाप राजा का खून चूस लेना, परन्तु ध्यान रहे, उसे पीड़ा का आभास नहीं होना चाहिए।’’ ‘‘जैसा तुम कहोगी, बिलकुल वैसा ही होगा।’’ यह कहकर खटमल शयनकक्ष में राजा के आने की प्रतीक्षा करने लगा। रात ढलने पर राजा वहां आया और बिस्तर पर पड़कर सो गया। उसे देख खटमल सबकुछ भूलकर राजा को काटने लगा, खून चूसने के लिए।

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ऐसा स्वादिष्ट खून उसने पहली बार चखा था, इसलिए वह राजा को जोर-जोर से काटकर उसका खून चूसने लगा। इससे राजा के शरीर में तेज खुजली होने लगी और उसकी नींद उचट गई। उसने क्रोध में भरकर अपने सेवकों से खटमल को ढूंढकर मारने को कहा। यह सुनकर चतुर खटमल तो पंलग के पाए के नीचे छिप गया लेकिन चादर के कोने पर बैठी जूं राजा के सेवकों की नजर में आ गई। सेवको ने उसे पकड़ा और मार डाला। तथा इस प्रकार खटमल पर विश्वास कर जू को अपने प्राणो से हाथ धोना पड़ा ।

सार : अंत में इस कथा का यही सार है की अजनबियों पर कभी विश्वास मत करो। Panchatantra ki kahaniya

Panchtantra ki kahaniya – दिन में सपने मत देखो

एक गांव में एक लड़की अपनी मां के साथ रहती थी. वो लड़की मन की बहुत चंचल थी। वह अक्सर सपनों में खो जाया करती थी। वह दिन में भी सूंदर सूंदर कल्पना करती रहती थी। ऐसा करना उसे बहुत अच्छा लगता था।

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एक दिन वह दूध से भरा बर्तन लेकर शहर जाने की सोच रही थी। उसने अपनी मां से पूछा, “मां, मैं शहर जा रही हूं, क्या आपको कुछ मंगवाना है?”उसकी मां ने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए. हां, यह दूध बेचकर जो पैसे मिलें, उनसे तुम अपने लिए चाहो तो कुछ ले लेना।

वह लड़की शहर की ओर चल पड़ी। चलते-चलते वो फिर सपनों में खो गई. उसने सोचा कि ये दूध बेचकर भला मुझे क्या फ़ायदा होगा। ज़्यादा पैसे तो मिलेंगे नहीं, तो मैं ऐसा क्या करूं कि ज़्यादा पैसे कम सकूं… इतने में ही उसे ख़्याल आया कि दूध बेचकर जो पैसे मिलेंगे उससे वो मुर्गियां ख़रीद सकती है। वो फिर सपनों में खो गई“दूध बेचकर मुझे पैसे मिलेंगे, तो मैं मुर्गियां ख़रीद लूंगी, वो मुर्गियां रोज़ अंडे देंगी. इन अंडों को मैं बाज़ार में बेचकर काफ़ी पैसे कमा सकती हूं। उन पैसों से मैं और मुर्गियां ख़रीदूंगी, फिर उनके चूज़े निकलेंगे, उनसे और अंडे मिलेंगे… इस तरह तो मैं ख़ूब पैसा कमाऊंगी… ( Panchatantra ki kahaniya )

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लेकिन फिर इतने पैसों का मैं करूंगी क्या?…हां, मैं उन पैसों से एक नई ड्रेस और टोपी ख़रीदूंगी. जब मैं यह ड्रेस और टोपी पहनकर बाहर निकलूंगी, तो पूरे शहर के लड़के मुझे ही देखेंगे। सब मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे. पास आकर हाय-हैलो बोलेंगे. मैं भी इतराकर उनसे बात करूंगी। बड़ा मज़ा आएगा, लेकिन यह देखकर बाकी की सब लड़कियां तो मुझसे जलने लगेंगी. उन्हें जलता देख मुझे मज़ा आएगा। मैं उन्हें घूरकर देखूंगी और अपनी गर्दन इस तरह से स्टाइल में झटककर आगे बढ़ जाऊंगी।

यह कहते ही उस लड़की ने अपनी गर्दन को ज़ोर से झटका और गर्दन झटकते ही उसे सामने रखे एक पत्थर से ठोकर भी लग गई और दूध से भरा बर्तन, तो उसने सिर पर रख रखा था, नीचे गिरकर टूट गया। यह देख वो सदमे में आ गई और उसकी तंद्रा टूटी. मायूस होकर वो गांव लौटी।

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उसने अपनी मां से माफी मांगी कि उसने सारा दूध गिरा दिया। यह सुनकर उसकी मां ने कहा, “दूध के गिरने की चिंता छोड़ो, लेकिन एक बात हमेशा याद रखो कि जब तक अंडे न फूट जाएं, तब तक चूज़े गिनने से कोई फ़ायदा नहीं…” अथार्त सपने देखने की बजाय मेहनत करना सीखो। अपना काम से प्यार करो तभी तुम जीवन में सफल हो पाओगे। मां की हिदायत और इशारा दोनों उसको समझ में आ गया। उसकी मां यही कहना चाहती थी कि जब तक हाथ में कुछ हो नहीं, तब तक उसके बारे में यूं ख़्याली पुलाव नहीं पकाना चाहिए। ( Panchatantra ki kahaniya )

सार : ख़्याली पुलाव पकाने से या सपने देखने से कोई फ़ायदा नहीं। दिन में सपने देखकर उनमें खोने से कुछ नहीं होगा. अगर सच में कुछ हासिल करना है, तो हक़ीक़त में मेहनत करनी चाहिए।

आशा करती हूँ की आपको ये कहानियाँ पसंद आयी होंगी, मुझे अपनी suggestions, comments box में लिखना भूले …

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धन्यवाद,
ज्योति गोयनका

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