Ravan ki Janam katha / रावण की जन्म कथा / किस प्रकार हुआ था रावण का जन्म

रामायण में महाबलि रावण एक ऐसा पात्र था जो भगवान् श्री राम के उज्जवल चरित्र को उभारने का कार्य करता था | अगर रावण नहीं होता तो इस पूरे ग्रंथ का निर्माण ही नहीं होता इसलिए इसमें रावण का विशेष महत्‍व है। रावण एक उच्च कोटि के ब्राह्मण, अति बलशाली और विद्धान पंडित थे | जिनकी वेद-शास्त्रों पर अच्छी पकड़ थी और वह भगवान भोलेशंकर के परम भक्त थे । रावण को तंत्र, मंत्र, सिद्धियों तथा कई गूढ़ विद्याओं का ज्ञान था। रावण सोने की लंका का राजा था , रावण के दस सिर थे और इसलिए उन्हें दशानन के नाम से भी जाना जाता है।

पद्ममपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण, रामायण, महाभारत, आनंद रामायण, दशावतारचरित आ‍दि ग्रंथों में रावण का उल्‍लेख किया गया है। शास्त्रों के अनुसार रावण की जन्म कथा इस प्रकार से है :

रावण की जन्म कथा /Ravan ki Janam katha

बहुत समय पहले की बात है, देवताओं और दैत्यों ने समुंदर मंथन करने का निश्चय किया | समुंदर मंथन के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर श्री नारायण ने कश्यप अवतार लिया तथा मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर रखा, शेष नाग की रस्सी बनायीं गयी तथा समुंदर मंथन आरम्भ हुआ |

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मंथन के कुछ दिनों के पश्चात उसमे से हलाहल विष निकला, जिसके जहर से देवता, दानव, तीनो लोको के प्राणी, जीव जंतु और वनस्पति मूर्छित होने लगे | तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान् शिव ने उस विष का पान किया परन्तु उन्होंने वह विष अपने कंठ गले से नीचे नहीं उतरने दिया जिस कारण उनका कंठ नीले रंग का हो गया और भगवान शिव इस जगत में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्द हुए |

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अब फिर से समुन्दर मंथन आरम्भ हुआ, कुछ समय के पश्चात भगवान् शिव के मस्तक पर विष के प्रभाव से गर्मी होने लगी, तब चंद्रमा ने अपने एक अंश से सागर में प्रवेश किया तथा शीतलता के साथ बालरूप में प्रकट हुए | भगवान् शिव चंद्रमा की इस भक्ति से अत्यंत प्रसन हुए तथा उन्हें बालचंद्र के रूप में उन्हें अपने मस्तक पर सुशोभित किया |

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फिर मंथन आरम्भ हुआ, उसके पश्चात मंथन से कामधेनु गाय निकली, जो दानवो के भाग की थी, परन्तु दानवों ने वह गाय सप्तऋषियो को दान में दे दी | इसके पश्चात माता महालक्ष्मी प्रकट हुई जो भगवान् विष्णु के वाम भाग में विराजमान हो गयी | उसके पश्चात मंथन से ऐरावत हाथी, तथा उच्श्रैवा नामक घोड़ा प्रकट हुआ, जो देवताओं के भाग में चले गए |

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इसके पश्चात मंथन से मदिरा निकली, जो दानवों के भाग की थी, बाद में अमृत कलश लेकर भगवान के अंशावतार श्री धन्वंतरि प्रकट हुए | इसके पश्चात देवताओं और दैत्यों में अमृत के लिए विवाद उत्पन हो गया | उस विवाद को समाप्त करने के लिए भगवान नारायण मोहिनी के रूप में प्रकट हुए | भगवान नारायण ने देवताओं को एक पंक्ति में बिठा कर अमृत बाँटना आरम्भ किया | उस अमृत के पान से देवता अत्यंत शक्तिशाली हो गए तथा उन्होंने युद्ध में दैत्यों को परास्त कर दिया |

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इससे दानव दुखी होकर अपने गुरु जी के पास गए और उनसे देवताओं को परास्त करने का उपाय पूछा | यह सुन कर उनके गुरु ने कहा :

” देवता अमृत पान कर चुके है, इसलिए उन्हें परास्त करना अत्यंत दुर्लभ है परन्तु एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का पुत्र उन्हें परास्त कर सकता है |”

तब सब दैत्यों ने यह निर्णय किया की वे अपनी किसी कन्या का विवाह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण के साथ कर देंगे | तथा उनसे उत्पन हुआ पुत्र देवताओं को परास्त करेगा |

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तब एक दानव ने अपनी केशिनी नामक कन्या का विवाह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण विश्रवा के साथ करा दिया | एक अच्छी पत्नी का धर्म निभाते हुए केशिनी ने अपने पति विश्रवा की खूब सेवा की थी जिससे प्रसन्‍न होकर ऋषि विश्रवा ने केशिनी को वरदान मांगने को कहा था। तब केशिनी ने कहा कि उन्‍हें ऐसे पुत्रों का वरदान चाहिए जो देवताओं से भी ज्‍यादा शक्‍तिशाली हो और उन्‍हें हरा सके। ऋषि विश्रवा ने अपनी पत्नी को यह आशीवार्द दिया की उनकी यह मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी |

फलस्वरूप कुछ समय बाद केशिनी ने एक अद्भुत बालक को जन्‍म दिया जो दस सिर और बीस हाथों वाला अत्‍यंत तेजस्‍वी और बेहद सुंदर बालक था। केशिनी ने अपने पति से पूछा कि इस बालक के इतने हाथ और सिर क्‍यों हैं। तक ऋषि ने कहा

” तुमने अद्भुत बालक मांगा था इसलिए यह बालक अद्भुत है और इस जैसा कोई और नहीं है। “

ग्‍यारहवें दिन ऋषि ने उस बालक का नामकरण संस्‍कार किया और उसका नाम रावण रखा गया। और इस प्रकार महान तेजस्वी, महा पराक्रमी, विद्धान पंडित रावण का जन्म हुआ !!

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राम तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन रावण नाम का दूसरा कोई नहीं मिलेगा। रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था।   संगीत के क्षेत्र में भी रावण की विद्वता अपने समय में अद्वितीय मानी जाती है। वीणा बजाने में रावण सिद्धहस्त था। लंकाधिपति रावण ने अपहरण करके 2 वर्ष तक अपनी कैद में रखा था, लेकिन इस कैद के दौरान रावण ने माता सीता को छुआ तक नहीं था। रावण की इन विषेशता को यह संसार कभी नहीं भूल पायेगा। अंत में मै इन विद्वान् पंडित रावण को प्रणाम करती हूँ।

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धन्यवाद,
ज्योति गोयनका

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