शनिवार व्रत कथा/Shanivar Vrat katha

By | June 12, 2019

भगवान शनिदेव जिनके सर पर स्वर्ण मुकुट , गले में माला, शरीर पर नील रंग के वस्त्र, शरीर भी  इन्द्रनीलमणी के समान, हाथो में धनुष बाण  और त्रिशूल, गिद्द की सवारी, ऐसे भगवान् शनिदेव को हमारा नमस्कार । शनिवार व्रत कथा/Shanivar Vrat katha 1

हिन्दू पुराणों में  शनिदेव अपने क्रोध के कारण सर्वविख्यात है, ऐसा माना जाता है की भगवान् शनिदेव जिस पर क्रोधित हो जाते है उसका जीवन बहुत ही दुःखमयी हो जाता है, इसलिए हमारे पुराणों में भगवान शनिदेव को प्रसन करने के लिए कई उपायों का वर्णन किया गया है, जिसमे से सर्वोत्तम उपाय है ” शनिवार के दिन शनिदेव का व्रत ” ।

सूर्यपुत्र शनिदेव के इस व्रत मे काले तिल , काले उड़द और सरसो के तेल से उनकी पूजा की जाती है, और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है । अग्नि पुराण के अनुसार शनि ग्रह  की शांति के लिए “मूल नक्षत्र ” युक्त शनिवार से आरम्भ करके 7 शनिवार तक शनिदेव का व्रत और पूजा की जाती है ।

Shanivar vrat katha

एक समय सभी नवग्रहओं : सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में यह विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा और सबसे उत्तम ग्रह कौन है? सभी देवता आपसं में लड़ने लगे, और कोई निर्णय ना होने पर वे देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे, परन्तु राजा इंद्र, देवताओ की बात सुनकर घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी, इसलिए उन्होंने देवताओ से कहा ” हे देवगण , इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं. वह ही इसका निर्णय कर सकते हैं. इसलिए आप सभी उन्ही के पास जाये ” ।

सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और उन्हें अपना विवाद बताया। साथ ही उन्हें निर्णय के लिये भी कहा। राजा विक्रमादित्य इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वह जानते थे की वह जिस ग्रह को छोटा कहेंगे वही ग्रह उनसे कुपित हो जायेगा , परन्तु साथ ही साथ वह न्याय की राह भी नहीं छोड़ना चाहते थे . तब राजा को एक उपाय सूझा. उन्होंने सुवर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रखवा दिया . फ़िर उन्होंने सभी ग्रहो से निवेदन किया ” हे देवताओ आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें. जो अंतिम सिंहासन पर बठेगा, वही सबसे छोटा ग्रह होगा ” ।

इस क्रम के अनुसार लौह सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे. तो वही सबसे छोटे कहलाये. उन्होंने सोचा कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है. अब तो शनिदेव कुपित हो उठे और कुपित हो कर उन्होंने राजा से कहा “राजा ! तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं. परन्तु मैं शनिदेव तो पुरे ढाई से साढ़े-सात साल तक विराजमान रहता हूँ , मैंने तो बड़े बड़ों का विनाश किया है. जब श्री राम की साढ़े साती आयी तो उन्हें वनवास हो गया, जब रावण की साढ़े साती आयी तो उन्हें बंदरों की सेना से परास्त होना पढ़ा. हे राजन , अब तुम सावधान रहना. ” ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले और अन्य देवता खुशी खुशी चले गये ।

कुछ समय बाद राजा की कुंडली में शनि की साढ़े साती आयी. तब योजनानुसार शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आये. उनके साथ कई बढ़िया घोड़े थे. राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी. उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु चुना, राजा ज्यों ही उस घोड़े पर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा. और भीषण वन में पहुंच वह घोड़ा अंतर्धान हो गया, राजा वन में भूखा प्यासा भटकता रहा. तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया. राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी भेंट में दे दी. वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और नगर में उसने अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया.

वहां एक सेठ की दूकान पर पहुँच कर राजा ने जल इत्यादि पिया. और कुछ विश्राम भी किया. भाग्यवश उस दिन सेठ की दुकान में बहुत बिक्री हुई. खुश होकर सेठ उसे भोजन इत्यादि कराने उसे अपने साथ घर ले गया. भोजन करते समय राजा ने वहां एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है. थोड़ी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार वहां से गायब हो चूका है, सेठ ने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है। उसने वीका को कोतवाल के पास पकड़वा दिया। फिर राजा ने भी उसे चोर समझ कर उसके हाथ पैर कटवा दिये। वह वीका चैरंगिया बन गया।और नगर के बहर फिंकवा दिया गया।

सयोंग से वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे वीका की दशा देख कर दया आ गयी और उसने वीका को अपनी गाडी़ में बिठा लिया। वीका अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा। और धीरे धीरे इस प्रकार पूरे साढ़े सात वर्ष बीत गए , और राजा की शनि दशा भी समाप्त हो गयी। कुछ समय के पश्चात वर्षा ऋतु का आगमन हुआ, अब तो वह वीका मल्हार गाने लगा। तब वह जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को वह राग इतना भाया, कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने अपनी दासी को उसे ढूंढने के लिए भेजा। तब दासी ने बताया कि वह गाने वाला तो एक चौरंगिया है। परन्तु राजकुमारी ना मानी। अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गयी, कि बिवाह करेगी तो उसी से। उसे बहुतेरा समझाने पर भी जब वह ना मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा। और इस प्रकार वीका का विवाह राजकुमारी से हो गया।

तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा: राजन्, देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है। ” तब राजा ने शनि देव से क्षमा मांगी, और प्रार्थना की , “हे शनिदेव जैसा दुःख मुझे दिया है, ऐसा किसी और को मत देना ।” शनिदेव मान गये, और कहा: हे राजन , जो मनुष्य मेरी कथा सुनेगा और व्रत करेगा , उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे।” साथ ही शनिदेव ने राजा को हाथ पैर भी वापस कर दिये। प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। यह सुनकर सभी अत्यंत प्रसन्न हुए ।

सेठ ने जब यह समाचार सुना, तो वह राजा के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, “सेठ, वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं।” सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या श्रीकंवरी से पाणिग्रहण का निवदन किया। राजा ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानियों मनभावनी और श्रीकंवरी को लेकर उज्जैन नगरी को वापिस चले। वहां पुरवासियों ने सीमा पर ही उनका स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। तब राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया थ, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बिताया ।

जो भक्त शनि देव के व्रत को श्रद्धा से करता है और इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिये ।

बोलो शनि देव की जय

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