Best Short Stories | Hindi kahani

By | November 8, 2019

भाई तू तो सच में बड़ा हो गया है।  (Short story)

सुंदरविहार के छोटे से कसबे में रमा नाम की एक 25 -26 साल की एक नौजवान युवती रहती थी, उसके विवाह को 4 वर्ष हो गए थे, मायका भी उसी शहर में था, मायके में एक छोटा भाई जतिन और उसकी माँ थी , जतिन दिल्ली शहर में पढ़ रहा था丨आज काफी दिनों के बाद रमा अपने मायके आयी हुई थी 丨

मायके आयी रमा माँ को हैरानी से देख रही थी। माँ बड़े ध्यान से आज के अखबार के मुख पृष्ठ के पास दिन का खाना सजा रही थी।  दाल, रोटी, सब्जी और रायता।  फिर झट से फोटो खींच व्हाट्सप्प करने लगीं। 
“माँ ये खाना खाने से पहले फोटो लेने का क्या शौक हो गया है आपको ?” 
“अरे वो जतिन बेचारा इतनी दूर रह हॉस्टल का खाना ही खा रहा है। कह रहा था की आप रोज लंच और डिनर के वक्त अपने खाने की तस्वीर भेज दिया करो उसे देख कर हॉस्टल का खाना खाने में आसानी रहती है।”
“क्या माँ, लाड-प्यार में बिगाड़ रखा है तुमने उसे।  वो कभी बड़ा भी होगा या बस ऐसी फालतू की जिद करने वाला बच्चा ही बना रहेगा !” रमा ने झट से शिकायत की। 
फिर रमा ने खाना खाते ही जतिन को फोन लगाया। 
“जतिन माँ की ये क्या ड्यूटी लगा रखी है?  इतनी दूर से भी माँ को तकलीफ दिए बिना तेरा दिन पूरा नहीं होता क्या?”
“अरे नहीं दीदी ऐसा क्यों कह रही हो।  मैं क्यों करूंगा माँ को परेशान?”
“तो प्यारे भाई ये लंच और डिनर की रोज फोटो क्यों मंगवाते हो?”
बहन की शिकायत सुन जतिन हंस पड़ा।  
जो जवाब दिया उसे सुन दीदी की ऑंखें भी छलक आयी। 
“दीदी पापा की मौत, तुम्हारी शादी और मेरे हॉस्टल जाने के बाद अब माँ अकेली ही तो रह गयी हैं।  पिछली बार छुट्टियों में घर आया तो कामवाली आंटी ने बताया की वो किसी- किसी दिन कुछ भी नहीं बनाती।  बस चाय के साथ ब्रेड खा लेती हैं या बस खिचड़ी।  पूरे दिन अकेले उदास बैठी रहती हैं।  बस तब उन्हें रोज ढंग का खाना खिलाने का यही तरीका सूझा।  मुझे फोटो भेजने के चक्कर में दो टाइम अच्छा खाना बनाती हैं।  बस फिर खा भी लेती हैं और इस व्यस्तता के चलते ज्यादा वह उदास भी नहीं होती।”
जवाब  सुन बहन की ऑंखें छलक आयी।

रूंधे गले से बस इतना बोल पायी 
“भाई तू तो सच में बड़ा हो गया है। ”

कर्मो का खेल -कर्म का लेन देन (Hindi kahani)

हमारे हिन्दू धर्म शास्त्रों में लिखा है की जिनके साथ हमारे कर्मो का लेना देना होता है , वो ही लोग इस जन्म में हमारे सगे संबंधी बन कर आते है , जैसे हमारे बेटा , बेटी, बहु, दामाद आदि 丨इसी विषय पर एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रही हूँ। ……

एक फौजी था। उसके मां नहीं, बाप नहीं, शादी नहीं, बच्चे  नहीं, भाई नहीं, बहन नहीं। अकेला ही कमा कमा के फौज में जमा करता जा रहा था, तो थोड़े दिन में एक सेठ जी जो फौज में माल सप्लाई करते थे, उनसे उनका परिचय हो गया और दोस्ती हो गई ।
सेठ जी ने कहा जो” तुम्हारे पास पैसा है वो उतने के उतने ही पड़ा हैं, तुम मुझे दे दो मैं कारोबार में लगा दूं ,तो पैसे से पैसा बढ़ जायेगा, इसलिए तुम दे दो।
फौजी ने सेठ जी को पैसा दे दिया। सेठ जी ने कारोबार में लगा दिया। कारोबार उनका चमक गया, खूब कमाई होने लगी, कारोबार बढ़ गया।
थोड़े ही दिन में लड़ाई लग गई। लड़ाई में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। घोड़ी इतनी बदतमीज थी कि जितनी ज़ोर ज़ोर से लगाम खींचे उतनी ही तेज़ भागे। खीेंचते खींचते उसके गल्फर तक कट गये लेकिन वो दौड़कर दुश्मनों के गोल में जाकर खड़ी हो गई। दुश्मनों ने वार किया,फौजी भी मर गया, घोड़ी भी मर गई।
अब सेठ जी को मालूम हुआ कि फौजी मर गया तो सेठ जी बहुत खुश हुए कि उसका कोई वारिस तो है नहीं, अब ये पैसा देना किसको। अब मेरे पास पैसा भी हो गया, कारोबार भी चमक गया, लेने वाला भी नहीं रहा ।
तो सेठजी बहुत खुश हुए। तब तक कुछ ही दिन के बाद सेठजी के घर में लड़का पैदा हो गया, अब सेठजी और खुश, कि भगवान की बड़ी दया है। खूब पैसा भी हो गया, कारोबार भी हो गया, लड़का भी हो गया,लेने वाला भी मर गया सेठ जी बहुत खुश। वो लड़का होशियार था,पढ़ने में समझदार था । सेठजी ने उसे पढ़ाया लिखाया, जब वह पढ़ लिखकर बड़ा हो गया तो सोचा कि अब ये कारोबार सम्हाल लेगा, चलो अब इसकी शादी कर दें।
शादी करते ही घर में आ गई बहुरानी, दुल्हन आ गई। अब उसने सोचा कि चलो, बच्चे की शादी हो गई अब कारोबार सम्हालेगा। लेकिन कुछ दिन में बच्चे की तबियत खराब हो गई। अब सेठ जी डाॅक्टर के पास, हकीम के पास, वैद्य के पास दौड़ रहे हैं। वैद्य जी जो दे रहे हैं, दवा खिला रहे हैं, और दवा असर नहीं कर रही, बीमारी बढ़ती ही जा रही। पैसा बरबाद हो रहा है,और बीमारी बढ़ती ही जा रही है, रोग कट नहीं रहा, पैसा खूब लग रहा है। अब अन्त में डाॅक्टर ने कह दिया कि” ला-इलाज मर्ज़ हो गया, इसको अब असाध्य रोग हो गया, ये बच्चा दो दिन में मर जायेगा।”

डाॅक्टरों के जवाब देने पर सेठ जी निराश होकर बच्चे को लेकर रोते हुए आ रहे थे रास्ते में एक आदमी मिला। कहा अरे सेठजी क्या हुआ बहुत दुखी लग रहे हो ?
सेठ जी ने कहा, ये बच्चा जवान था, हमने सोचा बुढ़ापे में मदद करेगा। अब ये बीमार हो गया शादी होते ही। हमने इसके लिये खूब पैसा लगा दिया, जिसने जितना मांगा उतना दिया, लेकिन आज डाॅक्टरों ने जवाब दे दिया, अब ये बचेगा नहीं। असाध्य रोग हो गया, लाइलाज मर्ज़ है। अब ले जाओ घर दो दिन में मर जायेगा। आदमी ने कहा अरे सेठजी, तुम क्यों दिल छोड़ रहे हो। मेरे पड़ोस में वैद्य जी दवा देते हैं। दो आने की पुड़िया खाकर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है। जल्दी से तुम वैद्य जी की दवा ले आओ। सेठ जी दौड़कर गये, दो आने की पुड़िया ले आये और पैसा दे दिया। पुड़िया ले आये बच्चे को खिलाई, बच्चा पुड़िया खाते ही मर गया।

बच्चा मर गया अब सेठजी रो रहे हैं, सेठानी भी रो रही और घर में बहुरानी और पूरा गांव भी रो रहा । गांव में शोर मच गया कि बहुरानी की कमर जवानी में टूट गई, सब लोग रो रहे हैं। तब तक एक महात्मा जी आ गये। उन्होनें कहा भाई क्यों रोना धोना।
लोग बोले- इस सेठ का एक ही जवान लड़का था वो भी मर गया ।
इसलिए सब लोग रो रहे हैं। सब दुखी हो रहे हैं।
महात्मा बोले- सेठजी रोना क्यों, सेठ-महाराज जिसका जवान बेटा मर जाये वो रोयेगा नहीं तो क्या करेगा। महात्मा-तो आपको क्यों रोना,
सेठ-मेरा बेटा मरा तो और किसको रोना। महात्मा-और उस दिन तो आप बड़े खुश थे।
सेठ-किस दिन ?
महात्मा-फौजी ने जिस दिन पैसा दिया था।
सेठ-हाँ, कारोबार के लिए पैसा मिला था तो खुशी तो थी।
महात्मा-और उस दिन तो आपकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सेठ-किस दिन ?
महात्मा-अरे जिस दिन फौजी मर गया,
सोचा कि अब तो पैसा भी नहीं देना पड़ेगा। माल बहुत हो गया,
कारोबार खूब चमक गया, अब देना भी नहीं पड़ेगा बहुत खुश थे।

सेठ-हां महाराज! खुश तो था।
महात्मा-और उस दिन तो आपकी खुशी का ठिकाना ही न था, पता नहींकितनी मिठाईयां बँट गईं।
सेठ-किस दिन ?  
महात्मा-अरे जिस दिन लड़का पैदा हुआ था।
सेठ-महाराज लड़का पैदा होता है
तो सब खुश होते हैं, मैं भी हो गया तो क्या बात।
महात्मा-उस दिन तो खुशी से आपके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे ।
सेठ-किस दिन ?
महात्मा-अरे जिस दिन बेटा ब्याहने जा रहे थे।
सेठ-महाराज बेटा ब्याहने जाता है
तो हर आदमी खुश होता है तो मैं भी खुश हो गया। महात्मा-तो जब इतनी बार खुश हो गए तो ज़रा सी बात के लिए रो क्यों रहे हो। सेठ-महाराज ये ज़रा सी बात है। जवान बेटा मर गया ये ज़रा सी बात है।
महात्मा-अरे सेठजी वहीं फौजी पैसा लेने के लिए बेटा बन कर आ गया। पढ़ने में, लिखने में, खाने में, पहनने में और शौक मेें, श्रृंगार में जितना लगाना था लगाया। शादी ब्याह में सब लग गया। और ब्याज दर ब्याज लगाकर डाक्टरों को दिलवा दिया। अब जब दो आने पैसे बच गये, वो भी वैद्य जी को दिलवा दिये और पुड़िया खाकर चल दिया। अब कर्मो का लेना देना पूरा हुआ।
सेठजी ने कहा:-हमारे साथ तो कर्मो का लेन देन था। चलो हमारे साथ तो जो हुआ सो हुआ। लेकिन वो जवान बहुरानी घर में रो रही है, जवानी में उसको धोखा देकर, विधवा बनाकर चला गया, उसका क्या जुर्म था कि उसके साथ ऐसा गुनाह किया। महात्मा बोले-यह वही घोड़ी है । जिसने जवानी में उसको धोखा दिया । इसने भी जवानी में उसको धोखा दे दिया। और इस तरह से दोनों का हिसाब किताब बराबर हुआ |
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वेद शास्त्रों में लिखा है, ” यह संसार कर्मो का लेखा जोखा है, कर्म की गति सो कोई नहीं बच पायेगा, जिस आत्मा को आप दुःख पहुंचा रहे है, वही आत्मा कभी न कभी आपके अपने ही घर में वापिस आएगी अपना हिसाब लेने के लिए”


उलटे भजन का सीधा भाव (Short stories)

एक बार एक व्यक्ति श्री वृंदावन धाम में दर्शन करने गया। दर्शन करके लौट रहा था। तभी एक संत अपनी कुटिया के बाहर बैठे बड़ा अच्छा पद गा रहे थे कि “हो नयन हमारे अटके श्री बिहारी जी के चरण कमल में”          बार-बार वह संत यही गाये जा रहे थे | उस संत के मुख से तभी उस व्यक्ति ने जब इतना मीठा पद सुना तो वह आगे ना बढ़ सका, और संत के पास बैठकर ही पद सुनने लगा और संत के साथ-साथ गाने लगा। 

कुछ देर बाद वह इस पद को गाता-गाता अपने घर जाने लगा , रास्ते में वह सोचता जा रहा था कि “वाह ! संत ने बड़ा प्यारा पद गाया।” जब घर पहुँचा तो वह पद भूल गया।अब वह याद करने लगा कि संत क्या गा रहे थे, बहुत देर याद करने पर भी उसे याद नहीं आ रहा था। फिर कुछ देर बाद उसने गाया “हो नयन बिहारी जी के अटके, हमारे चरण कमल में” इस प्रकार वह अनजाने में ही उलटा गाने लगा।

उसे गाना यह था “नयन हमारे अटके बिहारी जी के चरण कमल में” अर्थात बिहारी जी के चरण कमल इतने प्यारे हैं कि नजर उनके चरणों से हटती ही नहीं हैं। नयन मानो वही अटक के रह गए हैं। पर वह गा रहा था कि ” बिहारी जी के नयन हमारे चरणों में अटक गए “, अब यह पंक्ति उसे इतनी अच्छी लगीं कि वह बार-बार बस यही पंक्ति गाये जा रहा था।

आँखे बंद है, बिहारी के चरण हृदय में है और बड़े भाव से वह तो बस गाये जा रहा है। अब बिहारी जी तो ठहरे प्रेम भाव के भूखे , अपने भक्त के इस निश्चल प्रेम को देख कर वह अपने को रोक ना सके । बहुत समय तक जब वह गाता रहा, तो अचानक क्या देखता है ” सामने साक्षात् बिहारी जी खड़े हैं। और उसे प्रेम से निहार रहे है ” उसे अपने नेत्रों पर विश्वास ना हुआ, वह झट उनके चरणों में गिर पड़ा।

और इस प्रकार प्रेम की एक पंक्ति ने भगवान् और भक्त दोनों को मिला दिया । वास्तव में बिहारी जी ने उसके शब्दों की भाषा सुनी ही नहीं क्योकि बिहारी जी तो शब्दों की भाषा जानते ही नहीं है, वो तो बस एक ही भाषा जानते है और वह है भाव की भाषा, प्रेम की भाषा । भले ही उस भक्त ने उलटा गाया पर बिहारी जी ने उसके भाव देखे कि वास्तव में यह गाना तो सही चाहता है परन्तु शब्द उलटे हो गए, शब्द उलटे हुए तो क्या हुआ, उसके भाव तो कितने निर्मल है। और यही निर्मल भाव बिहारी जी को वहाँ तक खींच कर ले गए |

बोलो वृन्दावन बिहारी जी की जय , कृष्ण कन्हैया की जय

🙏
आशा करती हूँ , ये लघु कथाएं आपको पसंद आयी होंगी, अपने विचार मुझे comments box में लिख कर भेजे
धन्यवाद,
ज्योति गोयनका
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जय माता दी, मै ज्योति गोयनका आप सब का अपने इस ब्लॉग में स्वागत करती हूँ यह ब्लॉग मैंने माता रानी की प्रेरणा से हमारे समाज में धरम प्रचार का एक छोटा सा प्रयास करने के लिए बनाया है, माता रानी ने मेरे जीवन में बहुत से चमत्कार किये है, मेरा यह मानना है की सच्ची भक्ति और श्रदा से भाग्य में लिखा हुआ भी बदल सकता है, धरम के मार्ग पर चलकर किसी का बुरा नहीं हो सकता, इसी विश्वास को लेकर मैंने यह एक धार्मिक ब्लॉग बनाया है, आशा करती हूँ , मेरा यह प्रयास आप सबको पसंद आएगा, इस विषय में यदि आपके कुछ सुझाव हो मुझे अवशय लिखे , जय माता दी, ज्योति गोयनका

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