Tulsi Vivah 2019 | Tulsi vivah 2019 date | Tulsi vivah ki katha

By | November 3, 2019
tulsi vivah 2019
Image by Beeshma Acharya

Tulsi vivah 2019 – भारतवर्ष को देवभूमि भी कहा जाता है l जहाँ पर केवल देवी देवता ही नहीं बल्कि वृक्ष और पत्थर भी पूजे जाते है l ऐसा ही आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है, तुलसी का पौधा, जो इस पूरे जगत में ” तुलसी माता” के नाम से जानी जाती है l जिसे माता लक्ष्मी का ही रूप मान कर उनकी पूजा की जाती है l हिन्दू धर्म में माता तुलसी को “विष्णु प्रिया ” कहा जाता है l ऐसी मान्यता है की भगवान् विष्णु पर तुलसी पत्र अर्पित करने से वह बहुत प्रसन होते है और उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है l हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी माता और भगवान् विष्णु के रूप “शालिग्राम जी ” का विवाह सम्पन करवाया जाता है l

Mata Lakshmi ki Aarti 

बहुत से लोग अपनी मान्यताओं के अनुसार प्रभोदिनी एकदशी के दिन और बहुत से लोग द्वादशी के दिन माता तुलसी का विवाह भगवान् शालिग्राम से संपन करवाते है |

तुलसी विवाह का महत्व :

ऐसी मान्यता है की तुलसी विवाह करवाने से कई जन्मों के पाप नष्ट होते है | जो मनुष्य इस दिन व्रत करते है उन्हें भगवान् विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है | शास्त्रों के अनुसार जो जातक तुलसी माता का विवाह शालिग्राम जी के साथ करवाते है, उनके विवाह में आने वाली सभी बाधाए दूर हो जाती है और भगवान् विष्णु की कृपा से उनका विवाह शीघ्र हो जाता है | तुलसी विवाह करने वाले जातक को कई कन्यादान का फल प्राप्त होता है , इसलिए जिन जातको के घर में कन्या नहीं है, वे यथासंभव तुलसी माता का विवाह सम्पन करवा कर कन्यादान का फल प्राप्त कर सकते है |

तुलसी पूजा सम्पन करवाने से घर में सुख और सम्पति आती है तथा संतान भी नेक होती है | तुलसी विवाह सम्पन करवाने से विष्णु भगवान् भी प्रसन होते है जिस कारण पितृ दोष भी समाप्त होता है | और पितृ दोष समाप्त होते ही सभी बिगड़े काम बनने लगते है |

Tulsi vivah 2019 date और मुहर्त

इस वर्ष तुलसी विवाह 9 नवंबर 2019 (शनिवार) को पड़ रहा है द्वादशी तिथि आरम्भ होगी : नवंबर 8 ,2019 को 12 .24 पी एम बजे
द्वादशी तिथि समाप्त होगी : नवम्बर 09, 2019 को 02:39 पी एम बजे

Tulsi vivah ki katha

अम्बे तू है जगदम्बे काली

एक लड़की जिसका नाम वृंदा था, राक्षस कुल मैं उसका जन्म हुआ था,बचपन से ही उसमें कृष्ण भक्ति के बीज की धीमी धीमी सुंगध आने लगी थी, पूरी जिन्दगी उसने बड़े प्रेम भाव से प्रभु की सेवा पूजन किया,जब वह बड़ी हुई तो उसका विवाह राक्षस कुल के राजा जलंदर से हुआ ,जलंदर जल में ही जन्मा था,और वह राक्षस कुल का राजा था,लेकिन वृंदा इन सब से परे थी, वह सिर्फ निष्टा पूर्व अपना पत्नी धरम का पालन करती थी 丨

शादी के कुछ समय पश्चात् देवताओ और दानव में युद्ध हुआ,तभी वृंदा ने संकल्प लिया और अपने पति से कहा “हे स्वामी, जब तक आप युद्ध से वापिस नही आ जाते मैं पूजा में बैठ कर आपकी सलामती का अनुष्ठान करुँगी और यह संकल्प तब तक नही तोडूंगी जब तक आप वापिस नही आ जाते ” 丨 अब राजा जलंदर युद्ध में चले गए और वृंदा ने अपना अनुष्ठान आरंभ कर दिया 丨

वृंदा के अनुष्ठान के प्रभाव के कारण , युद्ध में जलंदर को कोई देवता नही जीत सका और तब सभी देवता हार कर भगवान् विष्णु के पास गए, सबने भगवान से रक्षा की प्रार्थना की, देवताओं की प्रार्थना सुन कर प्रभु ने कहा- “वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नही कर सकता . उस की भक्ति सच्ची है” यह सुन कर देवताओं ने कहा : ” भगवन और दूसरा कोई उपाए नजर नही आता, अब आप ही हमारी रक्षा करे और कोई उपाय निकाले 丨

tulsi vivah 2019
(Image by Narendra Pal Singh)

ऐसे में भगवान् विष्णु को एक उपाय सुझा , भगवान श्री विष्णु ने जलंदर का रूप धरा और वृंदा के सन्मुख जा के खड़े हो गये , वृंदा ने जेसे ही अपने पति को देखा तो वह अपने अनुष्ठान से उठ गई और अपने पति के चरण छुए, अब जैसे ही उसका अनुष्ठान टुटा, उधर वह देवताओ ने जलंदर का सर काट कर अलग कर दिया और जलंदर का कटा सर वृंदा के महल में आ गिरा 丨जब वृंदा ने अपने पति का कटा हुआ सर देखा तो वह सोच में पड़ गई “मेरे पति का सर यह है,तो मेरे सामने जो खड़े है, कौन है.??

एकादशी व्रत के नियम

वृंदा ने पुछा – आप कौन है.? तभी भगवान् अपने असली रूप मैं आ गए और कुछ ना बोले परन्तु वृंदा सब समझ गई और तभी वृंदा ने भगवान से कहा, “आपको तनिक दया नही आई मेरे पति को मरवाते हुए , मैं आपको को श्राप देती हूँ, की आज से आप पत्थर के हो जाओगे” 丨 वृंदा के इस श्राप के कारण प्रभु तुरंत पत्थर के बन गए, उनके पत्थर बनते ही देव लोक में हाहाकार मच गया, सभी देवता वृंदा के पास गये , माता लक्ष्मी भी बेहद रो रो कर विलाप करने लगी 丨सबकी प्रार्थना सुनने के बाद वृंदा ने प्रभु को श्राप से मुक्त किया और पति के सर के साथ अग्नि मैं सती हो गयी |

उनकी राख से फिर उसी समय एक पौधा निकला, उस पौधे को देख कर भगवान विष्णु ने कहा- “आज से इसका नाम तुलसी है. और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में यहीं रहेगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और मैं किसी भी वस्तु को बिना तुलसी के स्वीकार नही करूँगा , यह तुलसी मुझे प्राणों से भी प्यारी है | और उसी दिन से सभी देवता और मनुष्य तुलसी जी की पूजा करने लगे | इस पुरे जगत में तुलसी को माता के रूप में पूजा जाने लगा | फिर अंत में सभी देवताओ ने कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी के दिन शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह किया जिसे आज भी हम पूरे प्रेम और श्रद्धा से मनाते है |

आज भी देवउठनी एकादशी के दिन अथवा द्वादशी के दिन तुलसी माता के विवाह का आयोजन किया जाता है, कहा जाता है की इस दिन जो व्यक्ति तुलसी विवाह कथा सुनता या पढता है उसके सभी पापों का शमन होता है |

जय तुलसी माता जय तुलसी माता जय तुलसी माता जय तुलसी माता जय तुलसी माता

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About jyotee Goenka

जय माता दी, मै ज्योति गोयनका आप सब का अपने इस ब्लॉग में स्वागत करती हूँ यह ब्लॉग मैंने माता रानी की प्रेरणा से हमारे समाज में धरम प्रचार का एक छोटा सा प्रयास करने के लिए बनाया है, माता रानी ने मेरे जीवन में बहुत से चमत्कार किये है, मेरा यह मानना है की सच्ची भक्ति और श्रदा से भाग्य में लिखा हुआ भी बदल सकता है, धरम के मार्ग पर चलकर किसी का बुरा नहीं हो सकता, इसी विश्वास को लेकर मैंने यह एक धार्मिक ब्लॉग बनाया है, आशा करती हूँ , मेरा यह प्रयास आप सबको पसंद आएगा, इस विषय में यदि आपके कुछ सुझाव हो मुझे अवशय लिखे , जय माता दी, ज्योति गोयनका

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